अंतराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष :- यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता:
महिलाएं समाज की वास्तविक वास्तुकार होती हैं -

संवाददाता – के के शर्मा की कलम से ✍️✍️✍️✍️
भितरवार – अंतराष्ट्रीय महिला दिवस पर हर वर्ष 8 मार्च को मनाया जाता है विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के प्रति सम्मान , प्रशंसा और प्यार करते हूजे इस दिन को महिलाओं के आर्थिक , राजनीतिक और सामाजिक उपलब्धियों म उपलक्ष्य में उत्सव के तौर पर मनाया जाता है ।
भारतीय संस्कृति में नारी के सम्मान कक बहुत महत्व दिया गया है संस्कृत में एक श्लोक है ” यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता ” अर्थात जहां नारी की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं किंतु वर्तमान में जो हालात दिखाई देते हैं उसमें नारी का हर जगह अपमान होता चला जा रहा है उसे भोग की वस्तु समझकर आदमी अपने तरीके से इस्तेमाल कर रहा है यह बेहद चिंताजनक बात है लेकिन हमारी संस्कृति को बनाये रखते हुए नारी का सम्मान कैसे किया जाए , इस पर विचार करना आवश्यक है ।
*कब शुरू हुआ महिला दिवस ?? –*
दरअसल अंतराष्ट्रीय महिला दिवस एक मजदूर आंदोलन से उपजा है इसका बीजारोपण वर्ष 1908 में हुआ था जब 15 हजार औरतों ने न्यूयॉर्क शहर में मार्च निकालकर नोकरी में कम घण्टों की मांग की थी इसके अलावा उनकी मांग थी कि उन्हें बेहतर वेतन दिया जाए और मतदान करने का अधिकार भी दिया जाए । एक साल बाद सोशलिस्ट पार्टी ऑफ अमेरिका ने इस दिन को पहला राष्ट्रीय महिला दिवस घोषित कर दिया ।
*इसे अंतराष्ट्रीय बनाने का आइडिया आया कहाँ से ?? —*
ये आइडिया एक महिला का ही था क्लारा जेटकिन ने 1910 में कोपेनहेगन में कामकाजी महिलाओं की एक इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस के दौरान अंतराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का सुझाव दिया , उस वकग कॉन्फ्रेंस में 17 देशों की 100 महिलाएं मौजूद थी उन सभी ने इस सुझाव का समर्थन किया । सबसे पहले साल 1911 में ऑस्ट्रेलिया , डेनमार्क , जर्मनी औऱ स्विट्जरलैंड में अंतराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया था लेकिन तकनीकी तौर पर इस साल हम 111वां अंतराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे हैं 1975 में महिला दिवस को आधिकारिक मान्यता उस वक्त दी गयी थी जबसंयुक्त राष्ट्र ने इसे वार्षिक तौर पर एक थीम के साथ मनाना शुरू किया । अंतराष्ट्रीय दिवस की पहली थीम थी सेलीब्रेटिंग द पास्ट ,प्लानिंग फॉर द फ्यूचर ।
*माता का हमेसा सम्मान हो —*
मां अर्थात माता के रूप के नारी , धरती पर अपने सबसे पवित्रम रूप में है माता यानी जननी । मां को ईश्वर से भज बढ़कर माना गया है क्योंकि ईश्वर की भी जन्मदात्री भी नारी ही रही है मां देवकी (कृष्ण ) तथा मां पार्वती (गणपति/ कार्तिकेय ) के संदर्भ में हम देख सकते हैं इसे किंतु बदलते समय के हिसाब से संतानों ने अपनी मां को महत्व देना कम कर दिया है यह चिंताजनक पहलू है सब धन लिप्सा व अपने स्वार्थ में डूबते जा रहे हैं परंतु जन्म देने वाली माता के रूप में नारी का सम्मान अनिवार्य रूप से होना चाहिए , जो वर्तमान में कम हो गया है । यह सवाल आजकल यक्ष प्रश्न की तरह चहुंओर पांव पसारता जा रहा है इस बारे में नई पीढ़ी को आत्मावलोकन करना चाहिए । इतिहास उठाकर देखें तो माँ पुतलीबाई ने गाँधीजी व जीजाबाई ने शिवाजी महाराज में श्रेष्ठ संस्कारों में बीजारोपण किया था जिसका परिणाम है कि शिवाजी महाराज व गांधी जी को हम आज भी उनके श्रेष्ठ कर्मों के कारण जानते हैं जिनका व्यक्तित्व विराट व अनुपम है बेहतर संस्कार देकर बच्चे की समाज मे उदाहरण बनाना , नारी ही कर सकती है अंततः नारी सम्माननीय है ।
*इतिहास से –*
देवी अहिल्याबाई होलकर , मदर टेरेसा , इला भट्ट , महादेवी वर्मा ,राजकुमारी अमृत कौर , अरुणा आसिफ अली , सुचेता कृपलानी और कस्तूरबा गांधी आदि जैसी कुछ प्रसिद्ध महिलाओं ने अपने मन वचन व कर्म से सारे जग संसार मे अपना नाम रोशन किया है कस्तूरबा गांधी ने महात्मा गांधी का बायां हाथ बनकर उनके कंधे से कंधा मिलाकर देश को आजाद करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है ।
*कंधे से कंधा मिलाकर चलती है नारी –*
नारी का सारा जीवन पुरूष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने में ही बीत जाता है पहले पिता की छत्रछाया में उसका बचपन बीतता है पिता के घट में भी उसे घर का कामकाज करना होता है तथा साथ ही अपने पढ़ाई जारी रखनी होती है उसका यह क्रम विवाह तक जारी रहता है उसे इस दौरान घर के काम काज के साथ पढ़ाई की दोहरी जिम्मेदारी निभानी होती है जबकि इस दौरान लड़कों को पढ़ाई लिखाई के अलावा और कोज काम नहीं रहता है कुछ नवयुवक तो ठीक से पढ़ाई भी नहीं करते हैं जबकि उन्हें इसके अलावा और कोई काम ही नहीं रहता है कस नजरिये से देखा जाए तो नारी सदैव पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर तो चलती ही है बल्कि उनसे भज अधिक जिम्मेदारियों म निर्वहन करती है नारी इस तरह से भी सम्माननीय है ।
*विवाह पश्चात –*




