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मध्य प्रदेश
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लेजर और आधुनिक तकनीकों से अब आसान होगा बवासीर-फिस्टुला का इलाज

गजराराजा चिकित्सा महाविद्यालय में प्रोक्टोलॉजी पर हुआ मंथन

गजराराजा चिकित्सा महाविद्यालय के शल्य चिकित्सा विभाग द्वारा रविवार को सर्जिकल मैंनेजमेंट एंड अपडेट्स इन प्रोक्टोलॉजी विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय सीएमई का आयोजन हुआ। इसमें देशभर से आए विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि अब प्रोक्टोलॉजी से जुड़ी बीमारियां जैसे बवासीर, फिस्टुला और फिशर के इलाज में चीर-फाड़ की जरूरत कम हो गई है। लेजर और मिनिमली इनवेसिव (सूक्ष्म तकनीक) के जरिए मरीज को कम दर्द में जल्द राहत मिल रही है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मुंबई से आए एसीआरएसआई के प्रेसिडेंट डॉ. कुशल मित्तल थे। उन्होंने नई तकनीकों के व्यावहारिक पक्ष को साझा किया। विशिष्ट अतिथि के रूप में जीआरएमसी के डीन डॉ. आर.के.एस. धाकड़ और कैंसर अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. बी.आर. श्रीवास्तव मौजूद रहे। कार्यक्रम का मार्गदर्शन संरक्षक डॉ. एस.एम. तिवारी और डॉ. अचल गुप्ता ने किया। मुख्य अतिथि डॉ. कुशल मित्तल ने कहा कि प्रोक्टोलॉजी (बवासीर, फिस्टुला) से जुड़ी बीमारियों में लोग शर्म के कारण देरी से डॉक्टर के पास पहुंचते हैं। अब लेजर और मिनिमली इनवेसिव तकनीकों के कारण दर्द बहुत कम होता है और मरीज 24 घंटे में घर जा सकता है। समय पर जांच ही जटिलताओं से बचने का एकमात्र रास्ता है। जीआरएमसी डीन डॉ.आरकेएस धाकड़ ने कहा कि सर्जरी विभाग लगातार आधुनिक तकनीकों को अपना रहा है। इस तरह के राष्ट्रीय स्तर के आयोजनों से यहां के जूनियर डॉक्टरों को विश्वस्तरीय विशेषज्ञों से सीधे सीखने का मौका मिलता है, जिसका लाभ अंतत: अंचल के मरीजों को मिलेगा। आयोजन अध्यक्ष डॉ. अंजनी जलज और सचिव डॉ. राजेश प्रजापति ने बताया कि इस शैक्षणिक सत्र का मुख्य उद्देश्य रेजिडेंट डॉक्टरों और सर्जनों को नवीनतम शोध से अवगत कराना था। कार्यशाला में जटिल फिस्टुला में लेजर का बढ़ता प्रभाव, सर्जरी के बाद कम रिकवरी समय और गंभीर मामलों में सर्जिकल मैनेजमेंट के विकल्पों के मंथन पर भी चर्चा हुई। कार्यक्रम के अंत में विभाग के वरिष्ठ डॉक्टरों ने आभार व्यक्त किया और भविष्य में भी ऐसे रिसर्च-ओरिएंटेड आयोजनों की प्रतिबद्धता जताई। इस दौरान बड़ी संख्या में पीजी छात्र और स्टाफ मौजूद रहा।

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